भ्रस्टाचार
देश प्रेम का रहा न नाम,
लोगो ने बेच खाई देश की आन,
भूल गए सब भक्ति भाव,
फैल गया संस्कृति का अभाव,
लालच लगा रहा दांव पे दांव,
फैल रहें रिश्वत के पांव,
मुठ्ठी भर लोग कर रहे पुकार,
पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार !
सत्य खोजो तो कहीं न पाए,
असत्य का बोलबाला होता जाए,
कानून रह गया सिर्फ एक नाम,
अब लग चुके है इसके भी दाम,
इन्साफ सिर्फ रईस ही पाए,
गरीब हाहाकार करते ही रह जाए,
कब तक सहें यह अत्याचार,
पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार !
बेरोज़गार घूम रहे चारो ओर,
सामने टंगा है NO VACANCY का बोर्ड,
नौकरी भी अब रिश्वत से पाए,
रिश्तेदार पहले ही सीट पर हक़ जमाए,
काबिल बस घुमते ही रह जाए,
गुस्सा आये पर कुछ कर न पाए,
डिग्रीयों की क्या अब चिता जलाए ?
समाधान कैसे भी नजर न आए,
देख रहा सब ऊपर बैठा करतार,
पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार !
👌👌👌
ReplyDeleteTrue...
Nice 👌👌👌
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