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Showing posts from January, 2020

सूरज

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Sun..o..Mr. Sun.. Watch on YouTube मंद मंद मुस्काता है तू, यह सोच के की तेरे कितने दर्शनाभिलाषी है / एक झलक बस एक झलक,  यह नज़रें एक झलक की प्यासी है / तू आएगा तो यह धुन्ध की चादर हट जायेगी, सागर भी झूम उठेगा, यह दुनिया जन्नत सी नज़र आयेगी / एक झलक बस एक झलक,  यह नज़रें एक झलक की प्यासी है / --कीर्ति 

भ्रस्टाचार...कुछ और विचार

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हाय रे भ्रस्टाचार, हाय रे भ्रस्टाचार! आज़ादी सिर्फ नाम की है,  कल भी गुलाम थे आज भी है लाचार, फर्क सिर्फ इतना है,  कल अंग्रेज़ों के गुलाम थे  आज राज करता है भ्रस्टाचार  खूबसूरती तो बसती है देखने वाले की आँखों में, फिर क्यों महिलाओं के पहनावे पे BAN लगाते है, पहनावा ही जिम्मेदार है तो, क्यों आये दिन बच्चियों  के साथ भी हादसे हो जाते है? मोमबत्तियां जल के राख हो गई, चंद लम्हो के लिए हुआ विचार  कुछ फैसला हुआ नहीं, हाथ पे हाथ धरे बैठी सरकार    पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार,  पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार   कहने को तो हम लाखों में कमाते है, देश उन्नति के लिए आयकर भी जमा कराते है  Facilities के नाम पर GST की मार खाते है  बचे कुचे स्कूल एडमिशन में Management Quota में दे आते है  काम जल्दी कराने लिए, अफसरों को चाय पानी भी पिलाते है  इन सब में हम भी तो है भागीदार  फिर क्यों करते है? हाय रे भ्रस्टाचार, हाय रे भ्रस्टाचार! --कीर्ति 

भगवान् / प्रकृति

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भगवान् / प्रकृति  भगवान्  बोले :  ऐ - मनुष्य क्यों ढूँढ़ता फिरे मुझे तू  वन  वन में, घर घर में,  हिमालय और देवालय में  मांगता फिरे क्यों मेरा प्रत्यक्ष प्रमाण  हर कण कण में हूँ मैं  कहने को पत्थर ही सही, तुझपे अब तू जो भी मान! समक्ष हूँ तेरे मैं  मैं तो इस                    भू मि में हूँ  मैं ही शीतलता के         ग गन में  मैं तो इस                    वा यु में हूँ  मैं ही तपन की              अ गन में  मैं ही तो प्यास हूँ, मैं ही   नी र हूँ  मैं ही सूरज चाँद हूँ, मैं ही प्रकृति हूँ  ऐ  - नासमझ  मुझको पा जायेगा तू, बस एक जिंदगी बना दे, ला दे किसी के होठों पे मुस्कान, जन्नत यहीं ज़ह्नुम यहीं  फेर सिर्फ तेरे विचारों में हैं  न बदल इस जग को, की यह बदलेगा अपने आप...

भ्रस्टाचार

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पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार भ्रस्टाचार...कुछ और विचार देश प्रेम का रहा न नाम, लोगो ने बेच खाई देश की आन,  भूल गए सब भक्ति भाव,  फैल  गया संस्कृति का अभाव,  लालच लगा रहा दांव पे दांव,  फैल रहें रिश्वत के पांव,  मुठ्ठी भर लोग कर रहे पुकार,  पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार ! सत्य खोजो तो कहीं न पाए,  असत्य का बोलबाला होता जाए,  कानून रह गया सिर्फ एक नाम, अब लग चुके है इसके भी दाम,  इन्साफ सिर्फ रईस ही पाए,  गरीब हाहाकार करते ही रह जाए,  कब तक सहें यह अत्याचार,  पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार ! बेरोज़गार घूम रहे चारो ओर,  सामने टंगा है NO VACANCY का बोर्ड,  नौकरी भी अब रिश्वत से पाए,  रिश्तेदार पहले ही सीट पर हक़ जमाए,  काबिल बस घुमते ही रह जाए,  गुस्सा आये पर कुछ कर न पाए,  डिग्रीयों की क्या अब चिता जलाए ? समाधान कैसे भी नजर न आए,  देख रहा सब ऊपर बैठा करतार,  पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार ! पर दूर न हो यह भ्रस्टाचार ! --कीर्ति...