Dil Bola


दिल बोला




क्यों अनमना सा 

गुमसुम सा खड़ा तू

इतना बदहवास है

किस बात से है इतना डरा तू
ये कैसा आभास है
क्यों हौसले तेरे पस्त है
क्यों इतना दर्द जबरदस्त है
दिल बोला
देखो चारों ओर यहां
सब अपने में ही व्यस्थ है
कौन सुनेगा मेरी यहां 
आंख तो कोई मिलाता नहीं
कहने को लाखों दोस्त मेरे
वक़्त पे एक का भी साथ 
मैं पाता नहीं
ना जी सकूंगा ऐसे अकेलेपन में
ऐसा खोखलापन मुझे भाता नहीं
नफ़रत फैली है 
नकारात्मकता हर कहीं
वो दिन ढूंढता हूं
जब दिल से दिल बोला करते थे
मिट्टी के घरौंदे ही अच्छे थे
यहां कंक्रीट के जंगल में
हर शख़्स खोया है
जाने ये 
डिजिटाइजेशन और सोशल प्लेटफार्म 
का बीज किसने बोया है?

~कीर्ति


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