chal kahin dur nikal jaye
पीछे छोड़ क़दमों के निशान
डालें यूँही हाथों में हाथ
इन लहरों से होते हुए
चलें हम उस क्षितिज से परे
जहाँ मिलते हो धरती आकाश
यूँही चलते चले
चल कहीं दूर निकल जाए
मेरी आँखो से तेरे लब पे जो खिल के आती है
उस मुस्कान को लिए
यूँही देखते मुस्कारते हुए
चल कहीं दूर निकल जाए
तेरी बाहों के घेरे जो मुझे घेरे है
इन घेरों में यह लम्हा पिघले उससे पहले
यूँही एक दूसरे को थामे
चल कहीं दूर निकल जाए
तकरार को कर दरकीनार
उस इंकार से इकरार में
बिखेरते हुए बस प्यार
यूँही सारी यादों की सौग़ात बटोरते हुए
चल कहीं दूर निकल जाए /
--कीर्ति
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