Na Jaane Kyu? | Human Mindsets/Mentality | Life | Hindi Poetry Eng Subs ...



अहमियत कहाँ रह गयी इंसान की 
इंसान को ही सीढ़ी बना ऊँचायिया चढ़ जाते है लोग 
ना जाने क्यू इतना नीचे गिर जाते है लोग 

बस देखने का नज़रिया है ए-दोस्त 
यहाँ तो हीरे को भी पत्थर  बताते है लोग 
ना जाने क्यू पत्थर की चमक में चकाचोंद्द हो जाते है लोग 

ख़रीदने चले यह रिश्ते नाते 
प्यार मोहब्बत का करके मोल भाव 
इस व्यापार में 
ना जाने क्यू अपना सब कुछ बेच आते है लोग 

सब मिल जाए यह ज़रूरी तो नहीं 
फिर भी अरमानो के मेले लगाते है लोग 
खवाइशें पूरी करते करते 
ना जाने क्यू  अपना चैन भी गवाँ देते है लोग 

क़तरा के गुज़रते है, जैसे ना जान ना पहचान 
पर अपनी ज़रूरत पे मुस्कुरा देते है लोग 
ना जाने क्यू मतलब के लिए रिश्ते बना लेते है लोग 

ख़ुद आइना देखना भूल गए शायद 
आजकल सिर्फ़ औरों के नुक़्स निकलते है लोग 
अपने दुःख से दुखी कहाँ 
तु घाव खोल के बैठ, देख कैसे नमक लगाते है लोग 
ना जाने क्यू औरों की बर्बादियों पे शौक़ मचाते है लोग 

इतनी सीधी साधी सी ज़िंदगी 
क्यू इसे इतना जटिल बनाते है लोग?
ना जाने क्यू दोहरी ज़िंदगी जी जाते है लोग ?
ना जाने कैसे इतने मुखोटे लगाते है लोग?



--कीर्ति 

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