भगवान् / प्रकृति
ऐ - मनुष्य क्यों ढूँढ़ता फिरे मुझे तू
वन वन में, घर घर में,
हिमालय और देवालय में
मांगता फिरे क्यों मेरा प्रत्यक्ष प्रमाण
हर कण कण में हूँ मैं
कहने को पत्थर ही सही,
तुझपे अब तू जो भी मान!
समक्ष हूँ तेरे मैं
मैं तो इस भूमि में हूँ
मैं ही शीतलता के गगन में
मैं तो इस वायु में हूँ
मैं ही तपन की अगन में
मैं ही तो प्यास हूँ, मैं ही नीर हूँ
मैं ही सूरज चाँद हूँ, मैं ही प्रकृति हूँ
ऐ - नासमझ
मुझको पा जायेगा तू,
बस एक जिंदगी बना दे, ला दे किसी के होठों पे मुस्कान,
जन्नत यहीं ज़ह्नुम यहीं
फेर सिर्फ तेरे विचारों में हैं
न बदल इस जग को, की यह बदलेगा अपने आप
तेरे अन्तर्मन में कलह है, न काम आएंगे कोई जाप /
--कीर्ति
Awesome ... ati-sundar!
ReplyDeleteBahut ache.. Nice lines 👌👌👌
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